स्वयं को भी प्रभु को सौंप देना ही सच्ची शरणागति है : श्रीधराचार्य जी




श्री बंशीधर नगर : श्री श्री 1008 जगदगुरू रामानुजाचार्य स्वामी श्रीधराचार्य जी महाराज ने कहा कि स्वयं को भी प्रभु को सौंप देना ही सच्ची शरणागति है। वह शुक्रवार को चित्तविश्राम गांव में स्थित शिवमंदिर के प्रांगण में आयोजित श्रीमदभागवत कथा ज्ञान यज्ञ महोत्सव के चौथे दिन प्रवचन कर रहे थे। उन्होनें कहा कि भगवान भाव के भूखे होते हैं। श्रीधराचार्य जी महाराज ने कहा कि केवल खुद के लिये पैसा कमना चाहोगे तो होटल एवं बोतल में घूमते रह जाओगे। उन्होंने कहा कि पैसा कमाने का सही अर्थ है उसे सत्संग और भक्ति में खर्च करना। श्रीधराचार्य जी महाराज ने हिरणकश्यप को हरि भक्ति से दूर करने के लिये अनेकों प्रयास के बाद भी जब विमुख न कर सका तो अपनें पुत्र को ही मारनें के भी कई प्रयास किये। परंतु प्रहलाद को मार न सके क्योंकि जाको राखे साइयां मार सके न कोय। भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद के आस्था और विश्वास को बनाये रखने के।लिये हिरण कश्यप के खंभे में प्रहार के बाद खंभे से भी प्रगट हो गये। उन्होनें बताया कि जो कृपा भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद पे किया वो आजतक किसी पे नहीं किया। यहां तक कि अपनें पुत्र और पत्नी लक्ष्मी पर भी नहीं की। हिरण कश्यप वद्ध के बाद उन्होनें भक्त प्रह्लाद को अपनें गोद में बिठानें के बाद उनके माथे पर अपना कर-कमल फेरा था। उन्होंने श्रद्धालुआें से मन लगाकर कथा का रसपान करने की अपील की। उस मौके पर श्रीकांत तिवारी, कन्हैया चौबे, वीरेंद्र पांडेय, श्रीकांत मिश्रा, तेजप्रताप पांडेय, अमरनाथ पांडेय, प्रो कमलेश पांडेय, सुशील पांडेय, चंदन पांडेय, बंगाली सिंह समेत बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का रसपान किया।

 

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